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मध्य प्रदेश के सीहोर जिले में आदिवासियों के घरों और फसलों पर वन विभाग की कार्रवाई ने प्रदेश की राजनीति में उबाल ला दिया है। ग्राम कोसमी में बरेला समुदाय के कई आदिवासी परिवारों के मक्का की खड़ी फसल को नष्ट कर दिया गया और उनके आशियाने तोड़ दिए गए। इस घटना ने विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार को सरकार पर तीखे सवाल उठाने पर मजबूर कर दिया है। उन्होंने इसे सत्ता की खींचतान में गरीबों के उजड़ने का मामला बताते हुए मुख्यमंत्री मोहन यादव से जवाब मांगा है। वन विकास निगम द्वारा की जा रही इस बुलड़ोजर कार्रवाई से प्रभावित आदिवासी परिवारों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है। उनके सिर से छत छिन गई है और खेत में खड़ी फसल बर्बाद हो गई है। नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने इस मामले को सोशल मीडिया पर साझा करते हुए लिखा, 'मोहन-मामा की आपसी खींचतान में उजड़ रहे आदिवासी परिवार! ' उन्होंने वन विकास निगम द्वारा कार्रवाई का वीडियो भी पोस्ट किया है। उमंग सिंघार ने केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान के गृह क्षेत्र सीहोर के ग्राम कोसमी में हो रही इस कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए कहा कि, भाजपा सरकार की आपसी खींचतान के कारण गरीब आदिवासी परिवारों को बेघर होने का संकट झेलना पड़ रहा है। उन्होंने सवाल किया कि आखिर आदिवासियों का कसूर क्या है और सत्ता की इस रस्साकशी की सजा उन्हें क्यों भुगतनी पड़ रही है। नेता प्रतिपक्ष ने मुख्यमंत्री मोहन यादव से सीधी मांग की है कि वे आदिवासियों के खेत और घर उजाड़ने वाली इस कार्रवाई पर जवाब दें। उन्होंने यह भी पूछा है कि प्रभावित परिवारों को न्याय और सुरक्षा कब मिलेगी।
सूत्रों केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने जिला प्रशासन और वन विभाग के अधिकारियों से चर्चा कर आदिवासी परिवारों के घर न गिराने का निर्देश दिया था। इसके बावजूद वन विकास निगम द्वारा कार्रवाई जारी रखी गई, जिससे यह सवाल खड़ा हो गया है कि आखिर किसके आदेश पर यह कार्रवाई की गई। इस घटना ने एक बार फिर आदिवासी समुदायों के अधिकारों और उनकी जमीनों पर चल रहे विकास कार्यों के बीच टकराव को उजागर किया है। प्रशासन की कार्रवाई को लेकर स्थानीय लोगों में भी काफी नाराजगी है। वे जानना चाहते हैं कि क्या विकास के नाम पर आदिवासियों के जीवन को खतरे में डाला जा सकता है। वन विभाग की ओर से इस कार्रवाई को लेकर कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया है, लेकिन स्थानीय सूत्रों का कहना है कि यह भूमि वन विभाग के अधिकार क्षेत्र में आती है और उस पर अतिक्रमण किया गया था। हालांकि, सवाल यह उठता है कि क्या अतिक्रमण हटाने के लिए खड़ी फसलों को नष्ट करना और लोगों को बेघर करना ही एकमात्र उपाय था। इस पूरे मामले में अब राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया है। कांग्रेस जहां इसे आदिवासियों पर अत्याचार बता रही है, वहीं सत्ता पक्ष इस मामले में नियमों के पालन की बात कह रहा है। हालांकि, जमीनी हकीकत यह है कि प्रभावित परिवार आज भी अनिश्चितता के साये में जी रहे हैं। मुख्यमंत्री मोहन यादव की सरकार पर इस मामले में तुरंत हस्तक्षेप करने और प्रभावित परिवारों को राहत पहुंचाने का दबाव बढ़ गया है। विपक्षी दल इस मुद्दे को विधानसभा में भी उठाने की तैयारी कर रहे हैं, जिससे यह मामला और भी तूल पकड़ सकता है।
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