राजनीतिक नाराज़गी के बीच, भारत की भाजपा सरकार अपनी वैधता के संकट का सामना कर रही है। एक दशक से ज़्यादा समय से शासन की नाकामियों, आधिकारिक तौर पर इन्कार करने, सुनियोजित लूट, संस्थाओं पर हमलों और लोकतंत्र को कमज़ोर करने जैसे कारणों से पार्टी विश्वसनीयता के संकट से जूझ रही है। इन सबके साथ-साथ भारत के चुनाव आयोग (ईसीआई) के कामकाज ने भी देश भर में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शनों को जन्म दिया है। लोग अब एक ही मकसद के लिए बगावत कर रहे हैं: सत्ता प्रतिष्ठान के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाना। इस आंदोलन में जनमत को एकजुट करना और लोगों की भागीदारी व लामबंदी शामिल है। आम लोगों को अपनी ताकत का एहसास हो गया है, इसलिए जनमत को एकजुट करना ज़रूरी है। दोनों पक्षों के लिए पारदर्शिता भी होनी चाहिए। ईसीआई एक संवैधानिक संस्था है, और देश लोगों की पसंद की पवित्रता बनाए रखने के लिए जाना जाता है। उनके चुने हुए प्रतिनिधि सरकारी तंत्र का नेतृत्व करते हैं, इसलिए लोगों का भरोसा बनाए रखना आवश्यक है। लेकिन लोगों का भरोसा कम हुआ है, और मुद्दा सिर्फ़ मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) का नहीं है, बल्कि अनियमितताओं, मतदाता सूची और मतदान के आंकड़ों को लेकर भी सवाल उठे हैं। जिन लोगों के मतदान के अधिकार छीने गए, उनकी संख्या बहुत ज़्यादा है। उदाहरण के लिए, बिहार में 17 लाख और बंगाल में 91 लाख लोगों के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। ये सब मनमाने ढंग से नाम हटाने के मामले हैं, जो देश में अभूतपूर्व संकट पैदा कर रहे हैं। बुनियादी चीज़ों की कमी और सत्ताधारी भाजपा की वैधता पर सवाल उठने के कारण पारदर्शिता लगभग न के बराबर है। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, दो चुनाव आयुक्तों-सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी- ने ईसीआई के कामकाज से जुड़े कई मुद्दों पर आपत्ति जताते हुए 14 सवाल उठाए थे। बिना उन्हें बताए ही फै़सले लिए गए और निर्देश जारी किए गए, जो नाम हटाने, मतदाताओं के निबंधन के फार्म और तरीके में बदलाव और चुनावी डेटाबेस में सुधार के संदर्भ में थे। ईसीआई ने इन आरोपों पर कोई आपत्ति नहीं जताई, लेकिन कहा कि उसके ज़्यादातर फ़ैसले सर्वसम्मति से लिए गए थे। मौजूदा संकट की जड़ में देशव्यापी एसआईआर है, जिसमें ईसीआई मतदाता सूची की दोबारा जांच करता है और संदिग्ध मतदाताओं से पात्रता साबित करने को कहता है। एसआईआर ने 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में मतदाता सूचियों के ड्राफ़्ट से 13 करोड़ से ज़्यादा नाम हटा दिए हैं।
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भाजपा सरकार पर वैधता का संकट, चुनाव आयोग के कामकाज पर उठे सवाल
14 अक्टूबर 2026 को 5:58 pm बजे



