स्टार हेल्थ को इलाज का दावा निरस्त करने पर सेवा में कमी का दोषी पाया गया
ग्वालियर के जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोषण आयोग ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। आयोग ने स्पष्ट किया है कि मरीज को अस्पताल में भर्ती करना आवश्यक है या नहीं, इसका निर्णय केवल ही करेगा, बीमा कंपनी नहीं। आयोग ने स्टार हेल्थ एंड एलाइड इंश्योरेंस कंपनी को इलाज के खर्च का दावा निरस्त करने पर सेवा में कमी का दोषी ठहराया है। इस फैसले से बीमा कंपनियों की मनमानी पर अंकुश लगने की उम्मीद है, जो अक्सर मरीजों के इलाज के दावों को अमान्य कर देती हैं। यह मामला ग्वालियर निवासी निधि अग्रवाल से जुड़ा है। नवंबर 2023 में निधि को तेज बुखार, उल्टी और घबराहट की शिकायत हुई। डेंगू की जांच के बाद डॉक्टरों ने उन्हें अस्पताल में भर्ती करने की सलाह दी। इसके बाद उन्हें 3 से 7 नवंबर तक अस्पताल में भर्ती रखा गया, जहां इलाज पर 59,142 रुपये खर्च हुए। निधि ने इस खर्च के भुगतान के लिए बीमा कंपनी से संपर्क किया। बीमा कंपनी ने निधि के इलाज के दावे को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि अस्पताल में भर्ती होने की आवश्यकता नहीं थी और घर पर रहकर भी इलाज संभव था। कंपनी का यह तर्क मरीज के स्वास्थ्य और उसके उपचार की गंभीरता को नजरअंदाज करने वाला था। बीमा कंपनी के इस रवैये से निधि को काफी परेशानी का सामना करना पड़ा। मामले की सुनवाई करते हुए आयोग के अध्यक्ष राजेन्द्र प्रसाद शर्मा और सदस्य रेवती रमण मिश्रा की पीठ ने बीमा कंपनी की दलील को पूरी तरह से अस्वीकार कर दिया। पीठ ने पाया कि बीमा कंपनी ने सेवा में कमी की है और मरीज की चिकित्सा संबंधी जरूरतों को समझने में विफल रही है। डॉक्टरों की सलाह को नजरअंदाज करना कंपनी की लापरवाही को दर्शाता है। आयोग ने अपने फैसले में यह भी निर्देश दिया कि बीमा कंपनी परिवादी निधि अग्रवाल को इलाज का पूरा खर्च चुकाए। इसके अतिरिक्त, यदि कंपनी निर्धारित समय में भुगतान नहीं करती है, तो उसे उस पर ब्याज भी देना होगा। यह निर्णय बीमा कंपनियों को भविष्य में ऐसे मामलों में अधिक जिम्मेदार और ग्राहक-हितैषी बनने के लिए प्रेरित करेगा।



